सहारनपुर मस्जिद विध्वंस को लेकर जमीयत उलमा-ए-हिंद ने जताई नाराजगी, कानूनी लड़ाई लड़ने का ऐलान

Saharanpur Mosque Dispute Uproar

सहारनपुर : सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद के ध्वस्त के बाद मामले को लेकर जमीयत उलमा-ए-हिंद सक्रिय हो गई है। संगठन के केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को सहारनपुर पहुंचकर मामले की कानूनी, प्रशासनिक और सामाजिक स्थिति का जायजा लिया। प्रतिनिधिमंडल ने शहर के जिम्मेदार लोगों, अधिवक्ताओं, राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों के साथ बैठक कर आगे की रणनीति पर चर्चा की। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी की हिदायत पर महासचिव मौलाना मुहम्मद हकीमुद्दीन कासमी के नेतृत्व में केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल सहारनपुर पहुंचा। प्रतिनिधिमंडल ने पूर्व सांसद हाजी फज़लुर्रहमान, सांसद इमरान मसूद, भूमि से जुड़े स्वर्गीय याकूब खान के पौत्र फिरोज खान और शाह हारून खान, एडवोकेट नौशाद, मुकदमे के पक्षकार एडवोकेट तनवीर अहमद समेत अन्य लोगों से मुलाकात की।

इस दौरान मस्जिद के विध्वंस, प्रशासनिक कार्रवाई और मामले से जुड़े कानूनी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। जमीयत की ओर से कहा गया कि जिस दस्तावेज को फैसले का आधार बताया जा रहा है, उसके न्यायिक रिकॉर्ड में विधिवत दर्ज होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। साथ ही ‘सरकार-ए-हिंद’ से संबंधित रिकॉर्ड और विवादित भूमि के स्वामित्व के बीच संबंध को लेकर भी कानूनी प्रश्न बताए गए हैं। संगठन ने कहा कि इन सभी पहलुओं की दस्तावेजी और कानूनी जांच की जा रही है। अधिवक्ताओं के साथ हुई बैठक में राजस्व अभिलेखों, मस्जिद से संबंधित ऐतिहासिक दस्तावेजों, भूमि स्वामित्व के दावों और न्यायिक कार्यवाही से जुड़े बिंदुओं की समीक्षा की गई।

प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि मामले में उपलब्ध कानूनी विकल्पों पर विचार किया जा रहा है और जरूरत पड़ने पर उच्च न्यायालय समेत अन्य सक्षम न्यायिक मंचों का रुख किया जाएगा। मौलाना मुहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने कहा कि मामले से संबंधित दस्तावेज और साक्ष्य एकत्र किए जा रहे हैं। इन्हें जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के समक्ष रखा जाएगा। इसके बाद कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेकर अगला कदम तय किया जाएगा।
उन्होंने मस्जिद के विध्वंस पर चिंता जताते हुए कहा कि प्रभावित पक्ष को अपने बचाव और संवैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल का अवसर दिए बिना अचानक बुलडोजर की कार्रवाई करना स्वीकार्य नहीं है।

उन्होंने कहा कि अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार संवैधानिक न्याय का महत्वपूर्ण हिस्सा है और प्रशासनिक कार्रवाई ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे प्रभावित पक्ष के लिए उच्च न्यायालय या अन्य सक्षम न्यायिक मंच तक पहुंचना मुश्किल हो जाए। कासमी ने कहा कि यह मामला केवल किसी एक धर्म या समुदाय से जुड़ा मुद्दा नहीं है, बल्कि कानून के शासन, संवैधानिक अधिकारों और न्याय के सिद्धांतों से संबंधित है। उन्होंने कहा कि जमीयत उलमा-ए-हिंद न्याय के हर उपलब्ध कानूनी रास्ते पर जाएगी और जरूरतमंद लोगों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिए साथ खड़ी रहेगी।

जमीयत महासचिव ने कहा कि संगठन संविधान और कानून के दायरे में रहकर न्याय और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करता रहा है। सहारनपुर के मामले में भी कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके से न्याय की लड़ाई लड़ी जाएगी। उन्होंने सहारनपुर के लोगों से शांति और आपसी सद्भाव बनाए रखने की अपील की। कासमी ने कहा कि कठिन परिस्थिति के बावजूद शहर के लोगों ने शांति और भाईचारा कायम रखा है। उन्होंने कहा कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों में इस घटना को लेकर चिंता है और आपसी विश्वास तथा गंगा-जमुनी एकता ही सहारनपुर की ताकत है।

प्रतिनिधिमंडल में मौलाना कासिम नूरी, मौलाना अली हसन मजाहिरी, मौलाना अज़ीमुल्लाह सिद्दीकी, मौलाना मुहम्मद यूसुफ कासमी और हाफिज अबूबकर इब्ने मौलाना हकीमुद्दीन कासमी शामिल रहे। स्थानीय स्तर पर मौलाना गुलफाम मजाहिरी, मौलाना सरताज अहमद कासमी, मौलाना शमशीर कासमी, मौलाना अतहर, मौलाना फरीद मजाहिरी समेत बड़ी संख्या में स्थानीय पदाधिकारी और गणमान्य लोग मौजूद रहे।
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